Sunday, 5 May 2013

असुर लूटते लाज


करे न द्रोही पुत्र को भारत माँ स्वीकार
श्राप भयंकर दे चुकी शेष दण्ड का वार

है प्रधान मन्त्री सुनो भारत का जब मौन
सेना को निर्देश दे तब फिर बोलो कौन

भीरु बने जीते रहे तो जीना है व्यर्थ
राष्ट्र हेतु बलिदान दो जीवन का तब अर्थ

बढ़ो बन्धु पुरुषार्थ को तो पाओगे ध्येय
भोगो में रत हो नहीं सुरा त्याज्य है पेय

उठो वीर जागो करो धर्मकर्म विस्तार
असुर प्रभावी हो रहे वे धरती पर भार

जननी धरती भी सुनो पुत्र पुकारे आज
तुम निष्क्रिय बैठे तभी असुर लूटते लाज

रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

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