Wednesday, 8 May 2013

बढे फिर युद्ध पिपासा


और नहीं प्रिय दो मुझको तुम झूठ भरी अब व्यर्थ दिलासा
धर्म गया तप योग गया मन भारत का लगता अति प्यासा
वार प्रचण्ड करे अरि देख बढ़ा तम है हर ओर कुहासा
आज जगे फिर से यह भारत घोर बढे फिर युद्ध पिपासा
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

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