Thursday, 16 May 2013

प्रणाम है


नष्ट हो बनारसी प्रभात का प्रभाव चाह,
द्रोह से बची अयुद्ध क्षेत्र की न शाम है
और वन्दना विरोध व्यर्थ वे करें सदैव,
किन्तु रुद्ध भी उन्हें न चाँदनी न घाम है
माँ महान ये कुपुत्र को वरे, करे प्रदान,
किन्तु क्यों दुराग्रही कृतघ्नता सकाम है
मै ऋणी अपार, वन्दना करूँ, रहूँ कृतज्ञ,
भारती तुझे सदैव दास का प्रणाम है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

No comments:

Post a Comment