Monday, 6 May 2013

कुलोत्थान को


धारते धनुष बाण आसुरी विनाश हेतु पीत वस्त्र धारते हो देव कुलोत्थान को
पुण्डरीक के समान नेत्र वाले श्याम वर्ण करता प्रणाम रघुवंश वाली आन को
भो! अजानबाहु वाम जानकी करूँ प्रणाम उनके सहित तव सेवी हनुमान को
चाहता हूँ वेद ऋचा गूँजती रहे सदैव नष्ट कर दो तुरन्त आसुरी विधान को
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

No comments:

Post a Comment