Wednesday, 26 June 2013

विवेकबुद्धि योग में रही


कालिमावसाद की प्रचण्ड रूप धार आज देख लो मनुष्यते! महान कष्ट दे रही
मानवीयता व धर्म का स्वरुप मेट देख अर्थ को प्रधान मान प्राण मूल्य ले रही
साधु में न साधुता तमोगुणी हुए समस्त सिन्धु की सुता प्रसार भाव लोभ के रही
जाग आर्य! जाग! तू महान है बली अपार ज्ञान भी तुझे विवेकबुद्धि योग में रही
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

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