Sunday, 2 June 2013

काजल है


प्रिय ध्यान धरूँ तुमने उर पे अधिकार किया वह घायल है
यह सत्य प्रिये तव जीवन ही मम जीवन का शुचि सम्बल है
शशि के सम है मुख मंजु प्रकाशित मग्न हुआ यह भूतल है
मुझको वश में कर ले तव रूप अनूप बना कर काजल है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

No comments:

Post a Comment