Friday, 7 June 2013

विप्र उठो संकल्प लो

पाप बढ़ा तुम रोक लो करो तपस्या आज
विप्र उठो संकल्प लो धर्म करे अब राज !!दो०!!१

विप्र तपे यदि जीवन में तन में तब निश्चित रोग नहीं हैं
विस्मृत यों न करो तुम ज्ञान तुम्हे कब सिद्ध प्रयोग नहीं हैं
आज प्रलोभन हैं इतने जग में जितने कुल भोग नहीं हैं
सोच धरा पर पालन धर्म करें दिखते वह लोग नहीं हैं

है अभक्ष्य जो त्याग दो मत खाओ तुम प्याज
विप्र उठो संकल्प लो धर्म करे अब राज !!दो०!!२

मस्तक चन्दन भूषित हो शुचि वेद ऋचा रसना नित गाये
नित्य शिवत्व बढे तव जीवन मानवता हित गीत सुनाये
आसुर वृत्ति दबे तुमसे शठ साहस ही न कभी कर पाये
भारत हो द्विज सोच अखण्ड व आर्य ध्वजा फिर से लहराये

आर्य धरा पर फिर सुनो गिरे न कोई गाज
विप्र उठो संकल्प लो धर्म करे अब राज !!दो०!!३

दान करो नित ज्ञान समस्त प्रबन्धन भी जग को सिखलाओ
एक मनुष्य नहीं हर जीव महत्त्व रखे यह बात बताओ
शोषण ठीक नहीं तुम भूसुर हो हर शोषक को समझाओ
जो ऋषि वाक्य उन्हें अपनाकर पूर्ण धरा तुम आर्य बनाओ

होगा हर दिन पर्व फिर नित्य सजेगा साज
विप्र उठो संकल्प लो धर्म करे अब राज !!दो०!!४
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

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