Wednesday, 5 June 2013

प्रिये सींचो

मुझे कस लो सुनो भुजपाश में बस जोर से भींचो
अतल उर के हमारे घाव को औषधि बनो खींचो
विषैले बाण अन्तस को निरन्तर छेद देते हैं  ....
अरे उर वाटिका को नेह से कुछ तो प्रिये सींचो
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

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