Saturday, 20 April 2013

बना समाज भेड़िया



देख लो मनुष्यता रही न आज शेष बन्धु आसुरी प्रवृत्ति वृद्धि दण्ड भी नहीं दिया
आर्य भू कलंकिनी बनी कि वेदना अपार वक्ष पे प्रहार किन्तु दंश घूँट क्यों पिया
जो रजस्वला हुई न बालिका अबोध देख शील लूटने लगा बना समाज भेड़िया
वेद वेद-अंग व्यर्थ हो गया समग्र शास्त्र क्योंकि आर्यधर्म का प्रसार ही नहीं किया
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

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