Monday, 8 April 2013

औचित्य है


ज्ञान की रश्मियों को सहेजे सदा जो रहा सृष्टि में मात्र आदित्य है
मानवों को वही तो सुधा दान दे के सदा से किये बन्धु कृत्कृत्य है
झूमती है धरा झूमता व्योम भी तो उसी की कृपा से यहाँ नृत्य है
पृच्छकों जान लो धर्म को आज ये सूर्य को पूजने हेतु औचित्य है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
कवि, ज्योतिषाचार्य, साहित्याचार्य, धर्मरत्न, पी-एच.डी.
लखनऊ

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