Thursday, 18 April 2013

ठान है ठनी हुई


अर्थ लाभ सम्पदा मुझे न चाहिए परन्तु दान पुण्य यज्ञ हेतु कामना बनी हुई
क्या विडम्बना कि शान्ति चाहता असीम अम्ब किन्तु शत्रु दृष्टि व्यर्थ में रही तनी हुई
मै त्रिवर्ण केतु तान दूँ अधर्म हो विनष्ट दूँ मनुष्यता प्रसार ठान है ठनी हुई
और भारती सुभाल को सजा सकूँ अपूर्व दो महाबली बना कि चाह ये घनी हुई
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
लखनऊ

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