Wednesday, 17 July 2013

खड़े हम हैं


हनु पर काला तिल और लाल ये कपोल
मस्तक चमक रहा अक्षि मीन सम हैं
उर तन्त्रिका के सभी तार झंकृत हुए हैं
दन्तपंक्ति किंचित न मौक्तिकों से कम हैं
धनु के कमान जैसी भवें लख चकित हूँ
इन्दु मंजु आभा मुख निशायें पूनम हैं
अब न विलोक किसी और को प्रियम्वदे तू
तेरी दृष्टिपात याचना में खड़े हम हैं
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

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