Monday, 15 July 2013

गणात्मक घनाक्षरी (आशुतोष छन्द)



वेदना अपार चित्त में भरी हुई कि हाल दीन का बुरा मनुष्यता रही न शेष है
राजनीति भ्रष्ट राष्ट्र शत्रु से कुद्रष्ट कष्ट में पड़ी स्वभूमि देख व्याप्त मात्र क्लेश है
धर्म क्षेत्र में अधर्म का प्रसार है विराट और धर्म केतु जीर्ण शीर्ण क्षुद्र वेश है
काल आ गया कि आर्य त्याग दे प्रमाद आज भारती पुकारती पुकारता स्वदेश है

मित्र हो अदम्य साहसी उठो स्वचाप धार तीर वृष्टि हो अतीव तीव्र शत्रु वक्ष पर
वक्र दृष्टि आसुरी भले रहें परन्तु ध्यान ये धरो कि आर्यवीर श्रेष्ठ एक लक्ष पर
भोग और राष्ट्र द्रोह में निमग्न दुर्ग देख आज ही करो प्रहार दुष्ट भ्रष्ट कक्ष पर
ओज शौर्य शक्ति दो दिखा महान धर्म हेतु  पूर्ण विश्व घूमने लगे स्वराष्ट्र अक्ष पर
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
लखनऊ 

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