Tuesday, 28 January 2014
Friday, 17 January 2014
'आशुनिकुञ्ज' सवैया छन्द
हिन्दी साहित्य को चमत्कृत कर देने वाला छन्द 'आशुनिकुञ्ज' सवैया छन्द जिसे आज तक हिन्दी साहित्य के किसी साहित्यकार ने नहीं लिखा बड़े हर्ष और आह्लाद के साथ आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ...स्नेहाकांक्षी हूँ--
दीनों को देती हो लोकों को खेती हो पाता है वो भी जो हारा हो अम्बे!
धर्मालम्बी लोगों के पापों को धो देने वाली गंगा की धारा हो अम्बे!
दुष्टों को संहारा सन्तों को उद्धारा वीणा को धारे हो तारा हो अम्बे!
काली हो दुर्गा हो ज्वाला मातंगी हो त्रैलोकी तेरा जैकारा हो अम्बे!
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ
दीनों को देती हो लोकों को खेती हो पाता है वो भी जो हारा हो अम्बे!
धर्मालम्बी लोगों के पापों को धो देने वाली गंगा की धारा हो अम्बे!
दुष्टों को संहारा सन्तों को उद्धारा वीणा को धारे हो तारा हो अम्बे!
काली हो दुर्गा हो ज्वाला मातंगी हो त्रैलोकी तेरा जैकारा हो अम्बे!
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ
Monday, 9 December 2013
शत वन्दित है
भारतीय नागरिकों को जीत की हार्दिक बधाई देते हुए एक गीत के दो बन्द प्रस्तुत हैं--
विजय पताका गगन चूमती हुई आज अभिनन्दित है
इसीलिये तो सदा भारती पूजित है शत वन्दित है
दारुण कष्ट सहे इस धरती ने पिछले दस वर्षों में
हार गया जन जन था मन तब लगा नहीं संघर्षों में
तभी अस्त्र आ गया हाथ में मतरूपी फौलादी था
पटक दिया तुमने उसको जो दमन नीति का आदी था
पुष्प खिला है आज कमल भूमण्डल हुआ सुगन्धित है
इसीलिये तो सदा भारती पूजित है शत वन्दित है
महंगाई पर अंकुश सबसे पहली मांग हमारी है
अनुच्छेद विघटनकारी की अब हटने की बारी है
एक नियम क़ानून सभी के लिए मान्य करना होगा
अम्ब भारती का हर संकट इसी भाँति हरना होगा
सुनो इसी के हेतु प्रजा ने किया तुम्हे अनुबन्धित है
इसीलिये तो सदा भारती पूजित है शत वन्दित है
अड़चन सभी समाप्त करो अब तुम मन्दिर की नींव धरो
राजनीति के केन्द्र बिन्दु मोदी तुम आज उठो बिफरो
जन जन का सैलाब तुम्हारे साथ कि भगवा थाम चलो
एक बार फिर सनातनी तप की धारा में वीर जलो
भारत माँ को गर्व बड़ा सुत उनका महिमामण्डित है
इसीलिये तो सदा भारती पूजित है शत वन्दित है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ
विजय पताका गगन चूमती हुई आज अभिनन्दित है
इसीलिये तो सदा भारती पूजित है शत वन्दित है
दारुण कष्ट सहे इस धरती ने पिछले दस वर्षों में
हार गया जन जन था मन तब लगा नहीं संघर्षों में
तभी अस्त्र आ गया हाथ में मतरूपी फौलादी था
पटक दिया तुमने उसको जो दमन नीति का आदी था
पुष्प खिला है आज कमल भूमण्डल हुआ सुगन्धित है
इसीलिये तो सदा भारती पूजित है शत वन्दित है
महंगाई पर अंकुश सबसे पहली मांग हमारी है
अनुच्छेद विघटनकारी की अब हटने की बारी है
एक नियम क़ानून सभी के लिए मान्य करना होगा
अम्ब भारती का हर संकट इसी भाँति हरना होगा
सुनो इसी के हेतु प्रजा ने किया तुम्हे अनुबन्धित है
इसीलिये तो सदा भारती पूजित है शत वन्दित है
अड़चन सभी समाप्त करो अब तुम मन्दिर की नींव धरो
राजनीति के केन्द्र बिन्दु मोदी तुम आज उठो बिफरो
जन जन का सैलाब तुम्हारे साथ कि भगवा थाम चलो
एक बार फिर सनातनी तप की धारा में वीर जलो
भारत माँ को गर्व बड़ा सुत उनका महिमामण्डित है
इसीलिये तो सदा भारती पूजित है शत वन्दित है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ
Tuesday, 26 November 2013
कण्टक
सदा धर्म जो रक्षकों का रहे पालते से अहोरात्र खोये हुए हैं
उन्हें भी बड़ी लालसा प्रेम की चित्त में प्रीति के बीज बोये हुए हैं
नहीं तृप्त हैं वे तभी वासना दन्त को ही युगों से चुभोये हुए हैं
रहे कण्टकों से सदा दूर क्यों चित्त में वे व्यथाएं संजोये हुए हैं
कहो बेर की डालियों से चुने बेर तो क्यों उन्हें साथ लाते नहीं हो
छुओ प्रेम से युक्त हो भावनायें उन्हें मोम सा क्यों बनाते नहीं हो
चुभें भूल से भी नहीं कष्ट दें ये उन्हें बन्धुओं क्यों बताते नहीं हो
सदा कण्टकों को रहे कोसते कण्ठ से क्यों उन्हें भी लगाते नहीं हो
शूल कहो न इन्हे यह तो विधि के अनुरूप सदा जलते हैं
दैव कहो इनका कि सदा हर मानव के उर को खलते हैं
वायु प्रवाह भयंकर हो तब मान पराजय ये चलते हैं
ये अपमानित से पथ में गिरते ढलते अथवा गलते हैं
अवरुद्ध किया पथ कण्टक ने नर में वह पौरुष को भरता है
तप के हित मानव को इस भाँति सदा यह प्रेरित सा करता है
यह जीवन क्लिष्ट करे तब मानव भी लड़ वैभव को वरता है
फिर भी उपकार न मान सका इसका उरताप नहीं हरता है
फलों को पकाया सुरक्षा सदा दी न कच्चा उन्हें शत्रु भी तोड़ पाया
कली को बचा के करे देवसेवा नहीं पुष्प सत्कर्म को छोड़ पाया
सदा धर्म के मार्ग को ही गहा तो नहीं सन्त से नेह क्यों जोड़ पाया
यही भाग्य का लेख ये कण्टकों ने बताया न कोई इसे फोड़ पाया
सदा दुर्दिनों को रहे झेलते कण्टकों की व्यथा तीक्ष्ण हैं ये कड़े हैं
जहाँ कामिनी को छुआ प्रेम से चूनरी फाड़ दी लाज से ये गड़े हैं
इन्हे तो हटाया गया सत्पथों से यथा मान के दुष्ट सारे खड़े हैं
कभी छू सके हैं नहीं पाँव ये राम या कृष्ण के भी अभागे बड़े हैं
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ
उन्हें भी बड़ी लालसा प्रेम की चित्त में प्रीति के बीज बोये हुए हैं
नहीं तृप्त हैं वे तभी वासना दन्त को ही युगों से चुभोये हुए हैं
रहे कण्टकों से सदा दूर क्यों चित्त में वे व्यथाएं संजोये हुए हैं
कहो बेर की डालियों से चुने बेर तो क्यों उन्हें साथ लाते नहीं हो
छुओ प्रेम से युक्त हो भावनायें उन्हें मोम सा क्यों बनाते नहीं हो
चुभें भूल से भी नहीं कष्ट दें ये उन्हें बन्धुओं क्यों बताते नहीं हो
सदा कण्टकों को रहे कोसते कण्ठ से क्यों उन्हें भी लगाते नहीं हो
शूल कहो न इन्हे यह तो विधि के अनुरूप सदा जलते हैं
दैव कहो इनका कि सदा हर मानव के उर को खलते हैं
वायु प्रवाह भयंकर हो तब मान पराजय ये चलते हैं
ये अपमानित से पथ में गिरते ढलते अथवा गलते हैं
अवरुद्ध किया पथ कण्टक ने नर में वह पौरुष को भरता है
तप के हित मानव को इस भाँति सदा यह प्रेरित सा करता है
यह जीवन क्लिष्ट करे तब मानव भी लड़ वैभव को वरता है
फिर भी उपकार न मान सका इसका उरताप नहीं हरता है
फलों को पकाया सुरक्षा सदा दी न कच्चा उन्हें शत्रु भी तोड़ पाया
कली को बचा के करे देवसेवा नहीं पुष्प सत्कर्म को छोड़ पाया
सदा धर्म के मार्ग को ही गहा तो नहीं सन्त से नेह क्यों जोड़ पाया
यही भाग्य का लेख ये कण्टकों ने बताया न कोई इसे फोड़ पाया
सदा दुर्दिनों को रहे झेलते कण्टकों की व्यथा तीक्ष्ण हैं ये कड़े हैं
जहाँ कामिनी को छुआ प्रेम से चूनरी फाड़ दी लाज से ये गड़े हैं
इन्हे तो हटाया गया सत्पथों से यथा मान के दुष्ट सारे खड़े हैं
कभी छू सके हैं नहीं पाँव ये राम या कृष्ण के भी अभागे बड़े हैं
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ
Monday, 21 October 2013
आपकी शरण हूँ
मोहक स्वरूप आपका निहारता सदैव......अम्ब अमरत्व हित आपकी शरण हूँ
धर्म कलिकाल में बता रहा मैं जग मध्य असफल किन्तु जैसे ग्रन्थ मैं करण हूँ
सत्य कहता हूँ ऋषि वचन उपेक्षित हैं......कर्मकाण्ड में सुविज्ञ होता का हरण हूँ
माँ प्रभाव कुछ तो प्रसार दो स्वशक्तियुक्त..देख अति पीड़ित स्वदेश का क्षरण हूँ
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ
धर्म कलिकाल में बता रहा मैं जग मध्य असफल किन्तु जैसे ग्रन्थ मैं करण हूँ
सत्य कहता हूँ ऋषि वचन उपेक्षित हैं......कर्मकाण्ड में सुविज्ञ होता का हरण हूँ
माँ प्रभाव कुछ तो प्रसार दो स्वशक्तियुक्त..देख अति पीड़ित स्वदेश का क्षरण हूँ
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ
Tuesday, 24 September 2013
शिरोधार्य है
एक छन्द मन्दारमाला........
आशीष देते रहे वो सदा पूर्वजों का यही पुण्यदा कार्य है
कल्याण की चाह ही वे करें देख लो चित्त का बन्धु औदार्य है
सम्मान के पात्र वे हैं सदा ये सिखाता नहीं एक आचार्य है
जानो सदा वेद आदेश को जो तुम्हारे लिए ही शिरोधार्य है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ
Friday, 13 September 2013
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