Tuesday, 26 November 2013

कण्टक

सदा धर्म जो रक्षकों का रहे पालते से अहोरात्र खोये हुए हैं
उन्हें भी बड़ी लालसा प्रेम की चित्त में प्रीति के बीज बोये हुए हैं
नहीं तृप्त हैं वे तभी वासना दन्त को ही युगों से चुभोये हुए हैं
रहे कण्टकों से सदा दूर क्यों चित्त में वे व्यथाएं संजोये हुए हैं

कहो बेर की डालियों से चुने बेर तो क्यों उन्हें साथ लाते नहीं हो
छुओ प्रेम से युक्त हो भावनायें उन्हें मोम सा क्यों बनाते नहीं हो
चुभें भूल से भी नहीं कष्ट दें ये उन्हें बन्धुओं क्यों बताते नहीं हो
सदा कण्टकों को रहे कोसते कण्ठ से क्यों उन्हें भी लगाते नहीं हो

शूल कहो न इन्हे यह तो विधि के अनुरूप सदा जलते हैं
दैव कहो इनका कि सदा हर मानव के उर को खलते हैं
वायु प्रवाह भयंकर हो तब मान पराजय ये चलते हैं
ये अपमानित से पथ में गिरते ढलते अथवा गलते हैं

अवरुद्ध किया पथ कण्टक ने नर में वह पौरुष को भरता है
तप के हित मानव को इस भाँति सदा यह प्रेरित सा करता है
यह जीवन क्लिष्ट करे तब मानव भी लड़ वैभव को वरता है
फिर भी उपकार न मान सका इसका उरताप नहीं हरता है

फलों को पकाया सुरक्षा सदा दी न कच्चा उन्हें शत्रु भी तोड़ पाया
कली को बचा के करे देवसेवा नहीं पुष्प सत्कर्म को छोड़ पाया
सदा धर्म के मार्ग को ही गहा तो नहीं सन्त से नेह क्यों जोड़ पाया
यही भाग्य का लेख ये कण्टकों ने बताया न कोई इसे फोड़ पाया

सदा दुर्दिनों को रहे झेलते कण्टकों की व्यथा तीक्ष्ण हैं ये  कड़े हैं
जहाँ कामिनी को छुआ प्रेम से चूनरी फाड़ दी लाज से ये गड़े हैं
इन्हे तो हटाया गया सत्पथों से यथा मान के दुष्ट सारे खड़े हैं
कभी छू सके हैं नहीं पाँव ये राम या कृष्ण के भी अभागे बड़े हैं
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ




Monday, 21 October 2013

आपकी शरण हूँ

मोहक स्वरूप आपका निहारता सदैव......अम्ब अमरत्व हित आपकी शरण हूँ
धर्म कलिकाल में बता रहा मैं जग मध्य असफल किन्तु जैसे ग्रन्थ मैं करण हूँ
सत्य कहता हूँ ऋषि वचन उपेक्षित हैं......कर्मकाण्ड में सुविज्ञ होता का हरण हूँ
माँ प्रभाव कुछ तो प्रसार दो स्वशक्तियुक्त..देख अति पीड़ित स्वदेश का क्षरण हूँ
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

Tuesday, 24 September 2013

शिरोधार्य है

एक छन्द मन्दारमाला........
आशीष देते रहे वो सदा पूर्वजों का यही पुण्यदा कार्य है
कल्याण की चाह ही वे करें देख लो चित्त का बन्धु औदार्य है
सम्मान के पात्र वे हैं सदा ये सिखाता नहीं एक आचार्य है
जानो सदा वेद आदेश को जो  तुम्हारे लिए ही शिरोधार्य है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

Tuesday, 13 August 2013

कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो

राष्ट्र युवा शक्ति को नवीन आग दो
कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो

शत्रु चारों ओर से प्रहार है करे
एक भारतीय देख नित्य ही मरे
सत्ताधीश हमें लूट घर को भरे
पूर्ण चैन राष्ट्र का खड़े खड़े हरे
वीरता प्रसंग रहे धरे के धरे
लेखनी से निकलेंगे वचन खरे

शौर्य का उठो प्रवीण छेड़ राग दो
कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो

सीमा पर शत्रु का जमावड़ा बड़ा
जाने क्यों न फूटे अब पाप का घड़ा
वीर आर्यपुत्र मोह छोड़ के लड़ा
किन्तु शीर्ष देश का है निष्क्रिय खड़ा
लज्जावश राष्ट्र लगा भूमि में गड़ा
लेना होगा तुम्हे आज फैसला कड़ा

राष्ट्र धर्म के निमित्त आशु भाग दो
कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो

आम्भि जयचन्द व ओवैसी बढ़ते
राजनेता स्वार्थ के कुपन्थ गढ़ते
राष्ट्रद्रोही घातकर्म पाठ पढ़ते
शेर पे तभी तो हैं सियार चढ़ते
भारती को डायन बताते कढ़ते
और दोष हम पे वो नित्य मढ़ते

सन्तति में वीरता के रस पाग दो
कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो

राष्ट्र युवा शक्ति को नवीन आग दो
कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

Wednesday, 31 July 2013

तप्त रक्त युक्त हो शिरा शिरा

दिव्य भाव का प्रवाह लेखनी करे सदैव शब्द शब्द शक्तिपात आर्यवीर में करे
तप्त रक्त युक्त हो शिरा शिरा शरीर मध्य ओज शक्ति वीर्य तेज वो महानता भरे
शत्रु को विवेकहीन शक्तिहीन दे बना व धर्मद्रोह वृत्ति भूमि से वही सदा हरे
वेद वेद-अंग का प्रसार दिग्दिगन्त हो कि आर्यधर्म के लिए जिए मनुष्य या मरे
रचयिता
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ