Tuesday, 24 September 2013
Friday, 13 September 2013
Tuesday, 13 August 2013
कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो
राष्ट्र युवा शक्ति को नवीन आग दो
कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो
शत्रु चारों ओर से प्रहार है करे
एक भारतीय देख नित्य ही मरे
सत्ताधीश हमें लूट घर को भरे
पूर्ण चैन राष्ट्र का खड़े खड़े हरे
वीरता प्रसंग रहे धरे के धरे
लेखनी से निकलेंगे वचन खरे
शौर्य का उठो प्रवीण छेड़ राग दो
कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो
सीमा पर शत्रु का जमावड़ा बड़ा
जाने क्यों न फूटे अब पाप का घड़ा
वीर आर्यपुत्र मोह छोड़ के लड़ा
किन्तु शीर्ष देश का है निष्क्रिय खड़ा
लज्जावश राष्ट्र लगा भूमि में गड़ा
लेना होगा तुम्हे आज फैसला कड़ा
राष्ट्र धर्म के निमित्त आशु भाग दो
कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो
आम्भि जयचन्द व ओवैसी बढ़ते
राजनेता स्वार्थ के कुपन्थ गढ़ते
राष्ट्रद्रोही घातकर्म पाठ पढ़ते
शेर पे तभी तो हैं सियार चढ़ते
भारती को डायन बताते कढ़ते
और दोष हम पे वो नित्य मढ़ते
सन्तति में वीरता के रस पाग दो
कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो
राष्ट्र युवा शक्ति को नवीन आग दो
कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ
कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो
शत्रु चारों ओर से प्रहार है करे
एक भारतीय देख नित्य ही मरे
सत्ताधीश हमें लूट घर को भरे
पूर्ण चैन राष्ट्र का खड़े खड़े हरे
वीरता प्रसंग रहे धरे के धरे
लेखनी से निकलेंगे वचन खरे
शौर्य का उठो प्रवीण छेड़ राग दो
कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो
सीमा पर शत्रु का जमावड़ा बड़ा
जाने क्यों न फूटे अब पाप का घड़ा
वीर आर्यपुत्र मोह छोड़ के लड़ा
किन्तु शीर्ष देश का है निष्क्रिय खड़ा
लज्जावश राष्ट्र लगा भूमि में गड़ा
लेना होगा तुम्हे आज फैसला कड़ा
राष्ट्र धर्म के निमित्त आशु भाग दो
कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो
आम्भि जयचन्द व ओवैसी बढ़ते
राजनेता स्वार्थ के कुपन्थ गढ़ते
राष्ट्रद्रोही घातकर्म पाठ पढ़ते
शेर पे तभी तो हैं सियार चढ़ते
भारती को डायन बताते कढ़ते
और दोष हम पे वो नित्य मढ़ते
सन्तति में वीरता के रस पाग दो
कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो
राष्ट्र युवा शक्ति को नवीन आग दो
कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ
Wednesday, 31 July 2013
तप्त रक्त युक्त हो शिरा शिरा
दिव्य भाव का प्रवाह लेखनी करे सदैव शब्द शब्द शक्तिपात आर्यवीर में करे
तप्त रक्त युक्त हो शिरा शिरा शरीर मध्य ओज शक्ति वीर्य तेज वो महानता भरे
शत्रु को विवेकहीन शक्तिहीन दे बना व धर्मद्रोह वृत्ति भूमि से वही सदा हरे
वेद वेद-अंग का प्रसार दिग्दिगन्त हो कि आर्यधर्म के लिए जिए मनुष्य या मरे
रचयिता
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ
तप्त रक्त युक्त हो शिरा शिरा शरीर मध्य ओज शक्ति वीर्य तेज वो महानता भरे
शत्रु को विवेकहीन शक्तिहीन दे बना व धर्मद्रोह वृत्ति भूमि से वही सदा हरे
वेद वेद-अंग का प्रसार दिग्दिगन्त हो कि आर्यधर्म के लिए जिए मनुष्य या मरे
रचयिता
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ
Monday, 29 July 2013
शुभ दर्श दिखाओ
एक छन्द- मत्तगयन्द
आज चमत्कृत सा कर माँ इस जीवन में कुछ हर्ष दिखाओ
झंकृत वाद्य महाध्वनि भी किस भाँति उठे शत वर्ष दिखाओ
दो मुझको महनीय तपोबल .....भोग छटें प्रतिकर्ष दिखाओ
अम्बर आप अनादृत दो कर ..अम्ब मुझे शुभ दर्श दिखाओ
रचयिता
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ
आज चमत्कृत सा कर माँ इस जीवन में कुछ हर्ष दिखाओ
झंकृत वाद्य महाध्वनि भी किस भाँति उठे शत वर्ष दिखाओ
दो मुझको महनीय तपोबल .....भोग छटें प्रतिकर्ष दिखाओ
अम्बर आप अनादृत दो कर ..अम्ब मुझे शुभ दर्श दिखाओ
रचयिता
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ
Wednesday, 17 July 2013
खड़े हम हैं
हनु पर काला तिल और लाल ये कपोल
मस्तक चमक रहा अक्षि मीन सम हैं
उर तन्त्रिका के सभी तार झंकृत हुए हैं
दन्तपंक्ति किंचित न मौक्तिकों से कम हैं
धनु के कमान जैसी भवें लख चकित हूँ
इन्दु मंजु आभा मुख निशायें पूनम हैं
अब न विलोक किसी और को प्रियम्वदे तू
तेरी दृष्टिपात याचना में खड़े हम हैं
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ
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