Monday, 21 October 2013

आपकी शरण हूँ

मोहक स्वरूप आपका निहारता सदैव......अम्ब अमरत्व हित आपकी शरण हूँ
धर्म कलिकाल में बता रहा मैं जग मध्य असफल किन्तु जैसे ग्रन्थ मैं करण हूँ
सत्य कहता हूँ ऋषि वचन उपेक्षित हैं......कर्मकाण्ड में सुविज्ञ होता का हरण हूँ
माँ प्रभाव कुछ तो प्रसार दो स्वशक्तियुक्त..देख अति पीड़ित स्वदेश का क्षरण हूँ
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

Tuesday, 24 September 2013

शिरोधार्य है

एक छन्द मन्दारमाला........
आशीष देते रहे वो सदा पूर्वजों का यही पुण्यदा कार्य है
कल्याण की चाह ही वे करें देख लो चित्त का बन्धु औदार्य है
सम्मान के पात्र वे हैं सदा ये सिखाता नहीं एक आचार्य है
जानो सदा वेद आदेश को जो  तुम्हारे लिए ही शिरोधार्य है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

Tuesday, 13 August 2013

कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो

राष्ट्र युवा शक्ति को नवीन आग दो
कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो

शत्रु चारों ओर से प्रहार है करे
एक भारतीय देख नित्य ही मरे
सत्ताधीश हमें लूट घर को भरे
पूर्ण चैन राष्ट्र का खड़े खड़े हरे
वीरता प्रसंग रहे धरे के धरे
लेखनी से निकलेंगे वचन खरे

शौर्य का उठो प्रवीण छेड़ राग दो
कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो

सीमा पर शत्रु का जमावड़ा बड़ा
जाने क्यों न फूटे अब पाप का घड़ा
वीर आर्यपुत्र मोह छोड़ के लड़ा
किन्तु शीर्ष देश का है निष्क्रिय खड़ा
लज्जावश राष्ट्र लगा भूमि में गड़ा
लेना होगा तुम्हे आज फैसला कड़ा

राष्ट्र धर्म के निमित्त आशु भाग दो
कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो

आम्भि जयचन्द व ओवैसी बढ़ते
राजनेता स्वार्थ के कुपन्थ गढ़ते
राष्ट्रद्रोही घातकर्म पाठ पढ़ते
शेर पे तभी तो हैं सियार चढ़ते
भारती को डायन बताते कढ़ते
और दोष हम पे वो नित्य मढ़ते

सन्तति में वीरता के रस पाग दो
कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो

राष्ट्र युवा शक्ति को नवीन आग दो
कुछ काल हेतु ये अहिंसा त्याग दो
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

Wednesday, 31 July 2013

तप्त रक्त युक्त हो शिरा शिरा

दिव्य भाव का प्रवाह लेखनी करे सदैव शब्द शब्द शक्तिपात आर्यवीर में करे
तप्त रक्त युक्त हो शिरा शिरा शरीर मध्य ओज शक्ति वीर्य तेज वो महानता भरे
शत्रु को विवेकहीन शक्तिहीन दे बना व धर्मद्रोह वृत्ति भूमि से वही सदा हरे
वेद वेद-अंग का प्रसार दिग्दिगन्त हो कि आर्यधर्म के लिए जिए मनुष्य या मरे
रचयिता
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ 

Monday, 29 July 2013

शुभ दर्श दिखाओ

एक छन्द- मत्तगयन्द
आज चमत्कृत सा कर माँ इस जीवन में कुछ हर्ष दिखाओ
झंकृत वाद्य महाध्वनि भी किस भाँति उठे शत वर्ष दिखाओ
दो मुझको महनीय तपोबल .....भोग छटें प्रतिकर्ष दिखाओ
अम्बर आप अनादृत दो कर ..अम्ब मुझे शुभ दर्श दिखाओ
रचयिता
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ