Thursday, 9 May 2013

माँ की महानता का एक चित्र देखिये


पुलक उठा था तन मन अंग अंग मेरा जब प्रिय पुत्र गर्भ मध्य तू समाया था
पद जननी का किया तूने ही प्रदान मुझे थी अपूर्ण पूर्ण मुझे तूने ही बनाया था
हँस हँस के सदैव लोरियां सुनाईं तुझे निज तुष्टि हेतु तुझे वक्ष से लगाया था
जग कहे ऋणी पुत्र को सदैव माँ का किन्तु ऋणभार तूने पुत्र मुझपे चढ़ाया था
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
लखनऊ

Wednesday, 8 May 2013

बढे फिर युद्ध पिपासा


और नहीं प्रिय दो मुझको तुम झूठ भरी अब व्यर्थ दिलासा
धर्म गया तप योग गया मन भारत का लगता अति प्यासा
वार प्रचण्ड करे अरि देख बढ़ा तम है हर ओर कुहासा
आज जगे फिर से यह भारत घोर बढे फिर युद्ध पिपासा
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

ब्रह्म दिखे


लोभ न मोह न मत्सर हो तपनिष्ठ रहे यह जीवनधारा
मुक्त रहूँ बस तत्त्व गहूँ भवबन्धन काट मिले छुटकारा
हो धृति और क्षमा दमनेन्द्रिय मानवता हित चिन्तन सारा
ब्रह्म दिखे जड़ चेतन में कुछ भेद न हो अपना व तुम्हारा
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Tuesday, 7 May 2013

सैनिक संगिनि


सैनिक युद्ध निमित्त गया निज प्राण चला वह दांव लगाने
राष्ट्र महाऋण जो उसपे हर मूल्य चला वह आज चुकाने
वन्दन है अभिनन्दन है जग में अमरत्व चला वह पाने
वीर महा उसकी वह संगिनि पीर नहीं जिसकी जग जाने
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Monday, 6 May 2013

गणपति सुनो


अग्रपूज्य गणपति सुनो करूँ ब्रह्म का बोध
लिख कर कर दूँ व्यक्त भी रंच न हो अवरोध

प्रथम वन्दना आपकी रिद्धि सिद्धि के संग
पूर्ण करो संकल्प यह हो न सके व्रत भंग
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

यही तन्त्र उसे भाता है

सर्वश्रेष्ठ है विशाल भारतीय लोकतन्त्र पूर्ण विश्व मुक्त कन्ठ गान यही गाता है

 राष्ट्रभाव एक एक व्यक्ति में भरा हुआ है मान्यता कि पूर्ण देश भूमि नहीं माता है 

यद्यपि घोटाला भ्रष्टाचार भी बढ़ा अतीव किन्तु लोकतन्त्र यहाँ प्राण का प्रदाता है

 भारत का मतदाता है महान जागरूक इसीलिए मात्र यही तन्त्र उसे भाता है

 रचनाकार

डॉ आशुतोष वाजपेयी

ज्योतिषाचार्य

 लखनऊ 

कुलोत्थान को


धारते धनुष बाण आसुरी विनाश हेतु पीत वस्त्र धारते हो देव कुलोत्थान को
पुण्डरीक के समान नेत्र वाले श्याम वर्ण करता प्रणाम रघुवंश वाली आन को
भो! अजानबाहु वाम जानकी करूँ प्रणाम उनके सहित तव सेवी हनुमान को
चाहता हूँ वेद ऋचा गूँजती रहे सदैव नष्ट कर दो तुरन्त आसुरी विधान को
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ