Sunday, 5 May 2013

असुर लूटते लाज


करे न द्रोही पुत्र को भारत माँ स्वीकार
श्राप भयंकर दे चुकी शेष दण्ड का वार

है प्रधान मन्त्री सुनो भारत का जब मौन
सेना को निर्देश दे तब फिर बोलो कौन

भीरु बने जीते रहे तो जीना है व्यर्थ
राष्ट्र हेतु बलिदान दो जीवन का तब अर्थ

बढ़ो बन्धु पुरुषार्थ को तो पाओगे ध्येय
भोगो में रत हो नहीं सुरा त्याज्य है पेय

उठो वीर जागो करो धर्मकर्म विस्तार
असुर प्रभावी हो रहे वे धरती पर भार

जननी धरती भी सुनो पुत्र पुकारे आज
तुम निष्क्रिय बैठे तभी असुर लूटते लाज

रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

कुटुम्बियों ने ही बनाया है


क्रोध में अपार सिंहनी समान रूप धार
बोल पडी संगिनी मुझे सदा सताया है
काव्य साधना पथी बना रहा सदैव बोल
एक भी छदाम किन्तु क्यों नहीं कमाया है
एक लेखनी धनी दिखा मुझे मनुष्य मूर्ख
जो कि धनिकों के गेह जा के जन्म पाया है
और जो प्रसिद्धि पा गए उन्हें प्रसिद्ध भी तो
उनके धनी कुटुम्बियों ने ही बनाया है
रचनाकार
डॉ आशुतोष  वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Friday, 3 May 2013

कुछ दोहा छन्द


कुछ दोहा छन्द  प्रस्तुत हैं-----

कभी कभी मन में उठें प्रश्न बड़े गम्भीर
उत्तर प्राप्त न हो सकें बढ़ती जाती पीर

स्वार्थ बढ़ा जग में बड़ा द्रोह करें जन आज
भ्रष्टाचारी हो गया पूरा श्रेष्ठ समाज

सीमा पर घुसपैठ है शत्रु बना है चीन
भारत क्यों पुरुषार्थ से आज लग रहा हीन

क्यों प्रसार में है सफल आसुर पन्थ व काम
रावण घर घर में बढ़े कब आओगे राम

प्रभु इतनी सामर्थ्य दो धरा बना दूँ आर्य
कलियुग में यद्यपि कठिन लगता है यह कार्य

रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य, लखनऊ

Thursday, 2 May 2013

क्यों वीर हो रोध में


क्या हो रहा राष्ट्र में देख लो लोग आते नहीं क्यों कभी क्रोध में
क्यों भूल के दिव्य आर्यत्व को हैं लगे व्यर्थ के आसुरी शोध में
हुँकारती भूमि जो थी सदा आज क्यों तुष्ट है शान्ति के बोध में
पन्थी बनो वीरता पन्थ के नष्ट हो शत्रु क्यों वीर हो रोध में
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

प्राण त्याग के चला गया



स्वाभिमानहीन कार्यपालिका लखो कि देश को चला रही कुतथ्य वक्ष को जला गया
और आसुरी प्रहार हो रहे अनेक बार किन्तु राजनीति देख टूट हौसला गया
राक्षसी प्रवृत्तियुक्त शूकरों को मृत्युदण्ड दे दिया इसीलिये जवान वो छला गया
व्यर्थ दंश झेलता रहा अनेक वर्ष नेक सर्वजीत हाय प्राण त्याग के चला गया

सर्वजीत क्या गया चली गई कि आस साथ लोकतन्त्र देश का रहा नहीं हमारा है
ये प्रधान भी नपुन्सकी प्रवृत्ति युक्त बन्धु लूट लूट के हमें बना रहा बेचारा है
भारती सुवक्ष पे कुपुत्र का प्रहार देख सत्य धर्म का न शेष एक भी सहारा है
लो उठा महान शस्त्र हाथ में तुरन्त मित्र आर्यखण्ड, आर्यदेश पूर्ण ये तुम्हारा है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Wednesday, 1 May 2013

कथा अपनी है


मै पुरुषार्थ करूँ तुम वैभव भोग करो उर ठान ठनी है
शक्ति तुम्ही मम के हित हो तुमसे मिल के मन नित्य धनी है
कण्टक हों न कभी पथ में जिस ओर चलो अभिलाष घनी है
प्रेम कहीं पर भी जब उद्धृत हो समझो कि कथा अपनी है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

पिया करते हैं


क्या श्रम है श्रम का न महत्त्व अरे श्रम दीन किया करते हैं
पीर न शान्त न भूख गई चिथड़े वह नित्य सिया करते हैं
शोषक तो सब भोग करें लख जीवन ऐश जिया करते हैं
क्यों श्रम की महिमा गहते मधु भी श्रमहीन पिया करते हैं
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ